खटीमा में सीएम पुष्करधामी के समक्ष कड़ी चुनौती पेश करते कांग्रेस प्रत्याशी भुवन कापड़ी
कुलदीप सिंह राणा,देहरादून
उत्तराखंड में चुनाव प्रचार अंतिम चरण में पहुँच चुका है। शाम के 5 बजते ही चुनावी शोर थम जायेगा। चुनावी मैच में नाईट वॉचमैन की जिम्मेदारी निभा रहे सीएम पुष्कर धामी प्रदेश के सभी जिलों में प्रचार की अपनी जिम्मेदारी कर आखिर में अपनी विधानसभा खटीमा में पहुँच चुके है।अभी तक यहां प्रचार का पूरा जिम्मा पुष्कर धामी की पत्नी गीता धामी ने अपने कंधों पर उठा रखा था। जहां पति पूरे प्रदेश में पार्टी के लिये ताबड़तोड़ रैलियां और जनसभाएं कर रहे थे वहीं उनकी पत्नी घर-घर जाकर अपने पति की जीत को सुनिश्चित करने का अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभाती दिखायी दीं।

जीत और हार को निर्धारित करने वाली गेंद 14 फरवरी को मतदान केंद्रों में खेली जाएगी जहां मतदाता भाजपा के साथ ही पुष्कर धामी के राजनीतिक भविष्य का भी फैसला करेंगे। 2012 के विधानसभा चुनाव में आपने देखा है कि जनता में व्याप्त घोर असंतोष के बावजूद तत्कालीन मुख्यमंत्री खंडूरी के दम पर भाजपा 70 में से 31 सीट लाने में सफल हुई थी उन्ही खंडूरी है जरूरी को कोटद्वार में हार का सामना करना पड़ा था। जिसका अफसोस राज्य की जनता आज भी खलता है

खंडूरी की हार,भाजपा के साथ-साथ प्रत्येक राजनीतिक दल के नेता के लिए एक बड़ा सबक थी। अंतरकलह –भितरघात यह वह गुप्त हथियार है जिनकी मारक क्षमता राजनीति में सबसे घातक साबित रही है। फिर चाहे आपने जनाधार का कितना ही अमृत चखा हो आप चुनाव में सफल होंगे इसकी कोई गारंटी नही।
जनता का कहना है कि इसमें कोई दोराय नही कि दूसरी बार के विधायक पुष्कर धामी ने अपनी तमाम खूबियों खामियों के बावजूद अंतिम ओवरों में बहुत शानदार बैटिंग की।
तमाम गोपनीय सर्वे के बाद दो-दो सीएम बदलकर भाजपा ने जनता में सरकते जनाधार को पुनः पाने के लिये 6 माह पूर्व जो परिवर्तन किया राजनीतिक विश्लेषक उसे सत्ता की चौखट पर पुष्कर धामी की कूटनीतिक बलि मान रहे थे। किंतु अनुभवहीन कहे जा रहे पुष्कर धामी ने मात्र 6 माह के कार्यकाल जिस प्रकार अपनी राजनीतिक एवं प्रशासनिक क्षमताओं का प्रदर्शन किया उसे देख अब वही राजनीति के पंडित कह रहे है कि पुष्कर ने जनता में प्रदेश भाजपा के प्रति नाराजगी को कम करने की दिशा में शानदार प्रदर्शन किया है।जनता की नाराजगी पूर्व मुख्यमंत्री एवं भाजपा के शीर्ष नेतृत्व से हो सकती है किंतु पुष्कर धामी की कार्यकुशलता ने उन्हें काफी हद तक प्रभावित जरूर किया है। जनता में यह चर्चा आम है कि भाजपा को यह बदलाव काफी पहले कर देना चाहिये था। चुनाव का समय लिहाजा आरोप प्रत्यारोप लगते ही रहते है। लेकिन पुष्कर धामी को कम समय मिला है।
तो क्या जनता पुष्कर धामी को और फिर समय देना चाहती है। इसका सारा निर्णय अब प्रदेश के साथ खटीमा विधानसभा की जनता को भी करना है।

जहां भुवन चंद्र कापड़ी,कांग्रेस की तरफ से चुनावी मैदान में डटे हुए है। 2017 के चुनाव में कापड़ी को 2709 मतों से हार का सामना करना पड़ा था। इस बार वह पहले से ज्यादा तैयारी के साथ मैदान में अपनी ताल ठोक रहें हैं। यह चुनौती पुष्कर धामी के लिये घातक भी साबित हो सकती है क्योंकि 2012 के चुनाव में जीत के अंतर के 5394 के सापेक्ष 2017 में उक्त अंतर घट कर आधे पर पहुँच गया था। हालांकि 2017 से इतर इस चुनाव भुवन कापड़ी का मुकाबला सिटिंग मुख्यमंत्री से है। कल तक जनता जहां विधायक को चुनाती थी आज उस जनता के सामने सिटिंग मुख्यमंत्री चुनावी मैदान में है।सब कुछ खटीमा के मतदाता के विवेक पर निर्भर करता है।अब देखना यह है कि वह किसे चुनती है?