-अध्यक्ष पद पर डॉ जनानंद नौटियाल हैं नियुक्त.
-अपर सचिव आयुष डॉ विजय कुमार जोगदंडे ने जारी किये रोक के आदेश.
–नियम विरुद्ध तरीके से अध्यक्ष पद पर डॉ नौटियाल द्वारा प्राप्त किया जा रहा था राज्य मंत्री स्तर की सुविधाओं का लाभ.
-अध्यक्ष को सुविधायें दिये जाने का नहीं है कोई सरकार/शासन का आदेश.
-परिषद के एक्ट में भी नहीं है सुविधायें दिये जाने का उल्लेख.
सुविधाओं पर होता था प्रतिमाह लाखो रूपये खर्च.
क्या नियम विरुद्ध हुये उक्त खर्च की होंगी रिकवरी.

कुलदीप सिंह राणा, देहरादून
उत्तराखंड शासन ने अध्यक्ष डॉ नौटियाल द्वारा भारतीय चिकित्सा परिषद,उत्तराखंड से प्राप्त की जा रहीं समस्त सुविधाओं पर रोक लगा दी है। परिषद में अध्यक्ष की नियुक्ति की सयुंक्त प्रान्त (आयुर्वेदिक तथा यूनानी तिब्बी, चिकित्सा पद्धति )अधिनियम 1939 के भाग 2 की धारा 5(i) के आधार पर की जाती है।अध्यक्ष पद पर डॉ जनानंद नौटियाल की नियुक्ति भी उक्त नियम के आधार पर हुई है,नियुक्ति पत्र में कहीं भी किसी भी प्रकार की सुविधाएं दिये जाने का कोई उल्लेख नहीं है।बावजूद इसके वह राज्य मंत्री स्तर की समस्त सुविधाओं का लाभ उठा रहे थे।

बिना अनुमति के ली जा रही सुविधायें व लाभ
मानदेय व भत्ते –अध्यक्ष नियुक्त होने के बाद डॉ जनानंद नौटियाल द्वारा भारतीय चिकित्सा परिषद,उत्तराखंड के कोष से प्रतिमाह
रु 35,000 मानदेय
रु15000अन्य भत्ता
रु 2,000 दूरभाष भत्ता
कुल -52 हजार रूपये मानदेय प्राप्त किया जा रहा था।

समवर्ती स्टॉफ – इसके अलावा डॉ नौटियाल द्वारा अवैध तरीके से अपने लिये समवर्ती स्टॉफ भी नियुक्त किया था जिसकी कोई पूर्व अनुमति नहीं ली गयी जिन पर प्रतिमाह
रु15,000 निजि सचिव
रु15,000 वाहन चालक
रु 12,000 चतुर्थ श्रेणी
कुल 42 हजार रूपये का आर्थिक बोझ परिषद द्वारा वहन किया जा रहा था।

वाहन सुविधा-डॉ नौटियाल यही नहीं रुके उन्होंने परिषद से राजकीय वाहन की सुविधा भी प्राप्त कर रखी थी। जिसके ईधन पर प्रतिमाह हजारों रुपये खर्च परिषद को वहन करना पड़ता था।

वित्तीय अनियमितता की श्रेणी में-27जुलाई 2023 को रजिस्ट्रार भारतीय चिकित्सा परिषद् को जारी आदेश में अपर सचिव आयुष डॉ विजय कुमार जोगदंडे द्वारा स्पस्ट कहा गया है कि डॉ जनानंद नौटियाल को दी जा रहीं सुविधाएं, ‘जिनमे मानदेय समवर्ती स्टॉफ वाहन व पीओएल आदि शामिल है’, राज्य सरकार की अनुमति के बिना दी जा रहीं है जो कि न सिर्फ “परिषद के एक्ट में विहित व्यवस्था का उल्लंघन” है अपितु “वित्तीय अनियमितता” की श्रेणी में भी आता है।
डॉ नौटियाल द्वारा शासन के आदेशों का भी नहीं किया जाता था पालन
वर्ष 2009 में तत्कालीन अनुसचिव ओमकार सिंह द्वारा अध्यक्ष के लिये पदीय कर्तव्यों के निर्वहन हेतु स्थानीय स्तर की यात्रा के लिये एक आदेश जारी किया गया। जिसमे 150 ली. पेट्रोल/डीजल के साथ प्रतिमाह किराये के वाहन के माध्यम से व्यवस्था के आदेश जारी किये थे। साथ ही स्पस्ट किया था कि मुख्यालय के बाहर की यात्रा हेतु अध्यक्ष को विभागीय मंत्री का अनुमोदन प्राप्त किया जाना आवश्यक होगा। हालांकि यह आदेश भी एक्ट की व्यवस्था के अनुरूप उचित प्रतीत नहीं होता है।

किन्तु दस्तावेज बता रहे है कि डॉ नौटियाल बिना विभागीय मंत्री जो कि “स्वंम मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी है”, की अनुमति के राजकीय वाहन का दुरूपयोग करते हुये कभी हरिद्वार, कभी रुड़की, कभी उत्तराकाशी जहाँ जहाँ आयुष पैरमेडिकल शिक्षण संस्थान पहुँच जाया करते थे।उक्त भ्रमण को वाहन के लॉग बुक में शासकीय कार्य दर्शाया गया है। उक्त भ्रमण पर अध्यक्ष द्वारा क्या क्या शासकीय कार्य किये गये इसका कोई विवरण सूचना के अधिकार में मांगे जाने पर परिषद के द्वारा सूचना उपलब्ध न होना बताया गया है।हालांकि एक सच यह भी है कि परिषद के पूर्व रजिस्ट्रार द्वारा उक्त वाहन भी बिना शासन की सहमति के नियम विरुद्ध तरिके से ख़रीदा गया था।
सूचना अधिकार में प्राप्त राजकीय दस्तावेजों से स्पस्ट पता चलता है कि कैसे डॉ जनानंद नौटियाल मार्च 2022 से खुले आम मुख्यमंत्री की आँखों में धूल झोंक कर नियम विरुद्ध तरीके से परिषद से सुविधाओं का लाभ उठा रौब ग़ालिब कर रहे थे। दस्तावेजों से पता चलता है कि डॉ नौटियाल को शासन के अधिकारियों का भी संरक्षण प्राप्त है।
ऐसे में अब बड़ा सवाल यह उठाता है कि क्या उत्तराखंड सरकार डॉ नौटियाल के उक्त प्रकरण को भ्रष्टाचार मानती है या नहीं ?
क्या सरकार, उक्त प्रकरण में नियम विरुद्ध तरीके से परिषद से लिये गये भत्तों व अन्य खर्च की जाँच या रिकवरी आदेश के आदेश जारी करेगी?
इसी तरह का मामला आयुर्वेद विश्वविद्यालय में भी है सन 2017 से ऋषिकुल/ गुरुकुल आयुर्वेद कॉलेज हरिद्वार के शिक्षकों को विश्वविद्यालय का प्रभारी कुलसचिव बनाया जा रहा है। ये प्रभारी प्रतिदिन सरकारी गाड़ी से हरिद्वार से देहरादून जाते हैं तथा लाखो रुपए का गाड़ी के तेल तथा ड्राइवर के वेतन के रूप में सरकारी धन का दुरपयोग कर रहे है। जब प्रभारी ही बनाना है तो आयुर्वेद संकाय हररावाला के शिक्षक को भी तो बनाया जा सकता है। सरकारी वाहन चलाने के सभी नियमों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं इस विश्वविद्यालय में